*-अर्जुन झा-*
*जगदलपुर।* नक्सलियों के लाल आतंक के स्याह साये से मुक्त होते और उम्मीद के उजाले की ओर तेजी से अग्रसर बस्तर की एक खूबसूरत तस्वीर बस्तर संभाग के सुकमा जिले से सामने आई है। यहां की दुर्गम वादियों में करीब 650 मीटर की ऊंचाई पर बसे गांव गोगुंडा को जब बिजली की रौशनी ने अपने आगोश में ले लिया, तब वे चेहरे खुशी से खिल उठे, जो लाल आतंक के स्याह अंधेरे के कारण बुझे बुझे से नजर आते थे। यह गांव आज सिर्फ कृत्रिम रोशनी से नहीं, बल्कि नई उम्मीदों के प्राकृतिक उजाले से से दमक उठा है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के कुशल नेतृत्व में आजादी के 78 साल बाद, इस पहाड़ी गांव ने पहली बार बिजली के बल्ब की रोशनी देखी है। यह केवल एक तकनीकी सफलता नहीं, बल्कि उन चार दशकों के काले साये की हार है, जिसने इस गांव को विकास की मुख्यधारा से काट रखा था। कल तक जो गांव सूरज ढलते ही घने जंगलों और नक्सलियों के खौफ के सन्नाटे में डूब जाता था, वहां अब बच्चों की पढ़ाई और खुशियों की गूंज सुनाई दे रही है। ढिबरी और लालटेन के सहारे जीवन काटने वाले ग्रामीणों की आंखों में आज खुशी के आंसू हैं। गांव के बुजुर्ग माड़वी सुक्का ने कांपती आवाज में कहा कि हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि अपने जीते जी गांव में बिजली देख पाएंगे। आज पहली बार महसूस हो रहा है कि हमारा गांव भी देश के नक्शे पर मौजूद है। यह गांव दशकों तक नक्सलियों का गढ़ रहा है।यह ऐतिहासिक बदलाव रातों-रात नहीं आया है, बल्कि इसके पीछे सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन, जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन का वह अटूट संकल्प है, जिसने मौत के साये को मात दे दी है। सीआरपीएफ और पुलिस के संयुक्त प्रयासों से कैंप स्थापित हुआ, जिससे नक्सलियों का ‘सुरक्षित किला’ ढह गया। जहां पहले 5 घंटे पैदल पहाड़ चढ़ना पड़ता था, वहां सड़क बन जाने से अब विकास की गाड़ियां पहुंच रही हैं और ग्रामीणों की राह आसान हो गई है। कैंप बनते ही कलेक्टर अमित कुमार के नेतृत्व में स्कूल, आंगनबाड़ी और राशन दुकान जैसी बुनियादी सुविधाएं युद्ध स्तर पर शुरू की गईं।

*क्या कहा अफसरों ने?*
सुकमा कलेक्टर अमित कुमार ने बताया कि गोगुंडा में बिजली पहुंचना सामाजिक और आर्थिक बदलाव की शुरुआत है। हमारा लक्ष्य जिले के अंतिम छोर तक बिजली, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा पहुंचाना है। सुरक्षा और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं। गोगुंडा अब सुरक्षित है और यहाँ जल्द ही पुल-पुलियों का जाल बिछेगा। सीआरपीएफ 74वीं बटालियन के कमांडेंट हिमांशु पांडे ने कहा कि नक्सली दंश के कारण यह गांव दशकों पीछे था। कैंप की स्थापना के बाद मिली यह बिजली क्षेत्र में शांति और प्रगति का नया अध्याय लिखेगी।

*नई सुबह की शुरुआत*
गोगुंडा की यह रोशनी बस्तर के बदलते स्वरूप की कहानी कह रही है। यह कहानी है उस अदम्य साहस की, जिसने पहाड़ों का सीना चीरकर बिजली के खंभे गाड़े और उन ग्रामीणों की, जिन्होंने दशकों बाद लोकतंत्र पर अपना अटूट विश्वास जताया। अब गोगुंडा का अंधेरा स्थायी रूप से छंट चुका है और अब वहां सिर्फ भविष्य की चमक है।
