सुकमा, 24 फरवरी। (दुर्ग भिलाई अपडेट):छत्तीसगढ़ के सुदूर वनांचल में स्थित गोगुंडा गांव में आज एक ऐतिहासिक क्षण दर्ज हुआ। करीब 650 मीटर ऊंचाई पर बसे इस दुर्गम गांव में आजादी के 78 वर्ष बाद पहली बार बिजली पहुंची। वर्षों तक नक्सल प्रभाव और दुर्गम परिस्थितियों के कारण विकास से कटे इस गांव में अब उम्मीद की नई किरण जली है।
अंधेरे से उजाले तक का सफर
गांव में अब तक जीवन ढिबरी और टॉर्च की रोशनी में गुजरता था। सूर्यास्त के बाद गांव सन्नाटे में डूब जाता था, लेकिन अब बच्चों की पढ़ाई, घरों में रोशनी और ग्रामीणों के चेहरों पर मुस्कान साफ दिखाई दे रही है।
गांव के बुजुर्ग माड़वी सुक्का ने भावुक होकर कहा,
“हमने कभी नहीं सोचा था कि अपने जीवन में गांव में बिजली देख पाएंगे। आज सच में लग रहा है कि हमारा गांव भी देश के नक्शे पर है।”
सुरक्षा और प्रशासन का संयुक्त प्रयास
इस परिवर्तन के पीछे सुरक्षा बलों और प्रशासन का समन्वित प्रयास रहा।
सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन ने क्षेत्र में कैंप स्थापित कर सुरक्षा का मजबूत आधार तैयार किया।
पुलिस और सुरक्षा बलों की मौजूदगी से नक्सलियों के प्रभाव में कमी आई।
दुर्गम पहाड़ियों के बीच बिजली के खंभे गाड़े गए और लाइन बिछाई गई।
जिला कलेक्टर अमित कुमार के नेतृत्व में कैंप स्थापित होते ही गांव में स्कूल, आंगनबाड़ी और राशन दुकान जैसी मूलभूत सुविधाएं प्रारंभ की गईं।
कलेक्टर अमित कुमार ने कहा कि गोगुंडा में बिजली पहुंचना सामाजिक और आर्थिक बदलाव की शुरुआत है। प्रशासन का लक्ष्य जिले के अंतिम छोर तक सड़क, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना है।
बस्तर के बदलते हालात की मिसाल
यह उपलब्धि सिर्फ तकनीकी सफलता नहीं बल्कि दशकों के भय और अलगाव पर विकास की जीत है। गोगुंडा अब शांति और प्रगति की ओर बढ़ चुका है। पुल-पुलिया निर्माण और अन्य बुनियादी ढांचे के विकास की योजना भी तैयार की जा रही है।
गोगुंडा की पहाड़ियों पर जला यह पहला बल्ब अब सिर्फ रोशनी नहीं, बल्कि एक नए भविष्य की चमक का प्रतीक बन गया है।
