*-अर्जुन झा-*
जगदलपुर।* आंध्रप्रदेश में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में बस्तर संभाग के टॉप नक्सली कमांडर माड़वी हिड़मा और उसकी नक्सली पत्नी राजक्का उर्फ राजे का अंतिम संस्कार गृहग्राम पूवर्ती में किया गया। अंतिम यात्रा में जन सैलाब उमड़ पड़ा। नजारा ऐसा था मानो किसी बड़े जन नायक को अंतिम विदाई दी जा रही हो।इस दौरान बड़ी हैरान कर देने वाली तस्वीर भी देखने को मिली जब अंत्येष्टि में शामिल होने पहुंची तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोढ़ी ने खुलेआम हिड़मा का गुणगान किया, उसे क्रांतिकारी बताया और उसकी तुलना शहीद गुंडाधुर से कर डाली।
कई राज्यों में मोस्ट वांटेड एक करोड़ का ईनामी खूंखार नक्सली माड़वी हिड़मा और उसकी नक्सली पत्नी राजक्का उर्फ राजे आंध्रप्रदेश की सीमा पर सुरक्षा बलों से मुठभेड़ के दौरान मारे गए थे। पुलिस की वैधानिक कार्रवाई की खानापूर्ति के बाद हिड़मा दंपत्ति के शव बस्तर संभाग के सुकमा जिले के ग्राम पूवर्ती लाए गए। पूवर्ती हिड़मा का गृहग्राम है। यहां हिड़मा और उसकी पत्नी का अंतिम संस्कार किया गया। अंतिम संस्कार में ग्रामीणों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी, हर आंख में आंसू थे, महिलाएं छाती पीट पीट कर रो रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो ग्रामीणों ने अपना जन नायक खो दिया हो। हिड़मा की बूढ़ी मां अपनी झोपड़ी के बरामदे में खड़े होकर फूट फूट कर रो रही थी। मां को इस बात का गम था कि हिड़मा ने उसकी आत्मसमर्पण की अपील को अनसुना कर दिया था। मां को इस बात का भी मलाल था कि बेटे ने उसकी बात मानकर आत्मसमर्पण कर दिया होता, तो आज जिंदा रहता और समाज की मुख्यधारा से जुड़कर सम्मान जनक जिंदगी जी रहा होता। खैर ग्रामीणों के बीच हिड़मा की छवि जैसी भी रही हो, मगर इस दौरान चौंकाने और हैरान करने वाली यह बात सामने आई कि तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोढ़ी हिड़मा के कार्यों की खुलकर वकालत करती रही।हिड़मा की उसने नक्सलवाद की हिंसक रवैए को आदिवासी के शोषण से जोड़ा और हिड़मा को आदिवासी हितैषी और क्रांतिकारी बताया। सोनी सोढ़ी यहीं नहीं रूकीं उन्होंने हिड़मा की तुलना अमर शहीद गुंडाधुर से करते हुए कहा कि जिस तरह गुंडाधुर तीर धनुष लेकर आदिवासी समाज की रक्षा के लिए निकल पड़े थे, उसी तरह हिड़मा बंदूक लेकर शोषण के खिलाफ जंग में कूद पड़े थे। यह जंग तब तक जारी रहेगी, जब तक कि बस्तर मे आदिवासियों का शोषण बंद नहीं हो जाता। जहां सरकार नक्सलवाद से मुक्त प्रदेश की बात करती है वहीं कुछ ऐसे मानवाधिकार कार्यकर्ता बनने की आड़ लेकर लोग नक्सलियों को आदिवासी हितों की रक्षा करने वाला बता रहे हैं। सूत्रों ने बताया कि हिड़मा की अंत्येष्टि उसके ग्राम पूवर्ती में करने के बाद ऐसे तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता उसका स्मारक बनाकर उसे शहीद बताने और उसके मिशन की मशाल जलाकर इस अभियान को खत्म होने में बाधक बनने का प्रयास कर रहे हैं। सरकार को चाहिए कि वह ऐसे विचारों को पनपने ही न दे।
