*अर्जुन झा*
*जगदलपुर।* बस्तर अंचल की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान मानी जाने वाली मड़ई परंपरा के अंतर्गत प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला माघ मड़ई मेला इस वर्ष भी बस्तर विकासखंड के पल्लीभाटा गांव में परंपरागत श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। मड़ई मेले में भारी भीड़ रही।
बस्तर में मड़ई ग्रामीण आदिवासी अंचल का एक प्रमुख सांस्कृतिक एवं धार्मिक मेला है, जिसका आयोजन मुख्य रूप से फसल कटाई के बाद दिसंबर से मार्च के बीच किया जाता है। इस दौरान पारंपरिक ढोल–मोहरी की धुन, आदिवासी नृत्य करसार, देवी-देवताओं की परिक्रमा तथा नए चावल का भोग नुआखाई की परंपरा निभाई जाती है। माघ मड़ई मेला के अवसर पर गांव की प्रमुख आराध्य देवी दुलारदई माता के मंदिर प्रांगण में क्षेत्र के विभिन्न देवी-देवताओं का आगमन हुआ। परंपरा के अनुसार ढोल-मोहरी की अनंत नाद के बीच देवी-देवताओं ने मंदिर परिसर की परिक्रमा की। गांव के पुजारियों द्वारा विधिवत पूजा-अर्चना की गई। ग्राम के पटेल, माझी, कोटवार, सरपंच एवं पंचगणों की उपस्थिति में माघ मड़ई मेला का विधिवत शुभारंभ किया गया। मेला के दौरान महिलाओं, बच्चों एवं ग्रामीणों ने देवी देवताओं के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की और आशीर्वाद प्राप्त किया।
मेला का समापन बड़े ही उल्लासपूर्ण वातावरण में किया गया। रात्रिकालीन कार्यक्रम के अंतर्गत उड़िया नाटक का आयोजन किया गया, जिसे देखने के लिए आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। बच्चों, महिलाओं एवं क्षेत्रवासियों ने मेले का भरपूर आनंद लिया। पल्लीभाटा का माघ मड़ई मेला न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं और सामूहिक सामाजिक जीवन का जीवंत उदाहरण भी प्रस्तुत करता है।
