मुंबई, 21 जनवरी। भारतीय रुपया बुधवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.39 फीसदी की गिरावट के साथ 91.37 के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गया। वैश्विक बाजारों में जोखिम से बचने की बढ़ती प्रवृत्ति और ग्रीनलैंड को लेकर उभरते भू-राजनीतिक तनाव के कारण डॉलर की मांग तेज हो गई, जिसका सीधा असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर पड़ा।
अमेरिका और यूरोप के बीच संभावित व्यापारिक टकराव की आशंकाओं ने निवेशकों को सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर मोड़ा। भारतीय रिजर्व बैंक के बाजार में हस्तक्षेप के बावजूद रुपये पर दबाव बना रहा। करेंसी बाजार से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये की मौजूदा कमजोरी इसे वैश्विक झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील बना रही है।
ट्रेडर्स के अनुसार, जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनिश्चितता बढ़ती है, तो रुपये पर असर अन्य एशियाई मुद्राओं की तुलना में अधिक देखने को मिलता है। इसी कारण हालिया सत्रों में मुद्रा बाजार की गतिविधियों पर पैनी नजर रखी जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में भी वैश्विक घटनाक्रम रुपये की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।
रुपये में आई इस गिरावट का असर शेयर बाजार पर भी साफ नजर आया। मंगलवार को सेंसेक्स में 1,000 अंकों से अधिक और निफ्टी में 353 अंकों की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। विदेशी निवेशकों की बिकवाली से डॉलर की आवक घटी, जिससे स्थानीय मुद्रा पर दबाव और बढ़ गया।
हालांकि, ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 1 फीसदी से ज्यादा की गिरावट राहत का संकेत बनी। कच्चा तेल गिरकर करीब 64 डॉलर (लगभग 5,800 रुपये) प्रति बैरल पर आ गया, जिससे रुपये को फिलहाल सीमित सहारा मिला है।
