*अर्जुन झा*
*जगदलपुर।* सर्व आदिवासी समाज ने अनुसूचित क्षेत्र बस्तर में प्रस्तावित एवं आयोजित कार्यक्रमों में “पंडूम” शब्द के प्रयोग पर आपत्ति दर्ज कराते हुए उक्त शब्द को तत्काल हटाने एवं आदिवासी धार्मिक परंपराओं की संवैधानिक रक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। सर्व आदिवासी समाज के बस्तर संभाग अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने इस संबंध में राजयपाल, मुख्यमंत्री, आदिम जाति कल्याण मंत्री एवं शीर्ष अधिकारियों को पत्र प्रेषित किया है।
पत्र में प्रकाश ठाकुर ने कहा है कि वर्तमान में “बस्तर पंडूम” नाम से जिस प्रकार के शासकीय अर्ध-शासकीय अथवा सार्वजनिक आयोजन आयोजित किए जा रहे हैं, वह आदिवासी समाज की धार्मिक आस्था, परंपरा और जीवन-दर्शन के मूल स्वरूप के विपरीत हैं। “पंडूम” कोई उत्सव, प्रदर्शन, कार्यक्रम या प्रचारात्मक शब्द नहीं है। “पण्डुम आदिवासियों की पेन (देव) बुढ़ाल पेन, सजोर पेन, जिम्मेदारीन याया, डांड राव पेन, गांव गोसिन के सहयोगी पेन अर्थात देवों को गांव, परिवार के वडे, पुजारी, सिरहा, गायता के हाथों से सामुदायिक या पारिवारिक रूप से नए प्राकृतिक फल, फूल, अनाज, वनोपज की धार्मिक सेवा अर्जी पूजा पस्ट करने की विधिमय देव धामी तिहार को पंडुम कहते हैं। यह आदिवासी समाज की प्राचीन धार्मिक आस्था, सामूहिक चेतना, पारंपरिक अनुष्ठान और जीवन-प्रक्रिया से जुड़ा हुआ शब्द है। पंडूम के लिए परंपरागत रूप से निश्चित स्थान, समय, तिथि व दिन, मौसम, निर्धारित व्यक्ति (परंपरागत भूमिका-धारी), निर्धारित समुदाय, निर्धारित भाषा, निर्धारित सेवा-अर्जी अनुष्ठान का होना अनिवार्य है। श्री ठाकुर ने कहा है कि इनके बिना किसी भी आयोजन को पंडूम कहना परंपरा का सीधा सीधा विकृतिकरण है एवं असंगत है। संविधान का अनुच्छेद 244 अनुसूचित क्षेत्रों में प्रशासन को आदिवासी परंपरा, रीति-रिवाज एवं संस्थाओं के संरक्षण के अनुरूप संचालित करने का दायित्व राज्य पर डालता है।पेसा अधिनियम, 1996 ग्राम सभा को परंपरागत प्रथाओं एवं सांस्कृतिक पहचान की रक्षा का सर्वोच्च अधिकार देता है। बिना ग्रामसभा की सहमति के किसी भी परंपरागत शब्द या प्रक्रिया का शासकीय उपयोग पेसा की भावना के विपरीत है।संविधान का अनुच्छेद 29 आदिवासी समाज को अपनी विशिष्ट भाषा और संस्कृति के संरक्षण का मौलिक अधिकार प्रदान करता है।संविधान का अनुच्छेद 13 किसी भी राज्य कार्रवाई को मौलिक अधिकारों के प्रतिकूल होने से रोकता है।इन प्रावधानों के आलोक में “पंडूम” शब्द का इस प्रकार उपयोग हमारी संधार्मिक आस्था विश्वास, संवैधानिक रूप से आपत्तिजनक है।

*आदिवासी समाज की मांग*
प्रकाश ठाकुर ने आदिवासी समाज की ओर से मांग की हैं कि “बस्तर पंडूम” अथवा किसी भी शासकीय सार्वजनिक आयोजन में ‘पंडूम’ शब्द का प्रयोग तत्काल रोका जाए, इस शब्द को सभी शासकीय दस्तावेजों, प्रचार सामग्री एवं आयोजनों से हमेशा के लिए हटाया जाए, भविष्य में किसी भी आदिवासी परंपरागत शब्द, प्रक्रिया के उपयोग से पूर्व ग्रामसभा एवं आदिवासी समुदाय के धार्मिक कार्य करने वाले व्यक्तियों की स्वीकृति अनिवार्य की जाए एवं अनुसूचित क्षेत्र में सांस्कृतिक आयोजनों हेतु पेसा के अनुरूप स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
