*अर्जुन झा*
*जगदलपुर।* बस्तर जिले की भानपुरी तहसील अंतर्गत ग्राम करंदोला में पैतृक भूमि को लेकर सामने आया मामला केवल आपसी विवाद नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की मिलीभगत से रचा गया एक सुनियोजित भूमि घोटाला है। इस पूरे प्रकरण में फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी, कूटरचना, धोखाधड़ी, न्यायालयीन आदेश की अवहेलना और राजस्व रिकॉर्ड में खुली हेरफेर कर करोड़ों की जमीन हड़पने के गंभीर आरोप लगे हैं। आरोप है कि तत्कालीन पटवारी रामू कश्यप, मुख्य खातेदार का पुत्र जाहिद खान और कोंडागांव निवासी भूमि दलाल नेमीचंद सोनी ने मिलकर ऐसा संगठित खेल खेला, जिससे वैधानिक वारिसों को उनके हक से वंचित कर जमीन को कई टुकड़ों में बेच दिया गया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्राम करंदोला स्थित खसरा नंबर 153/1 सहित कुल पैतृक भूमि स्वर्गीय अब्दुल हसीम खान पिता अब्दुल रऊफ खान के नाम दर्ज थी। इस भूमि का कुल रकबा 2.570 हेक्टेयर था। मुस्लिम पर्सनल लॉ और राजस्व नियमों के अनुसार इस भूमि पर उनकी बहनों और भांजों सहित सभी वारिसों का समान अधिकार था। भूमि के विधिवत बंटवारे को लेकर तहसील और कमिश्नर कोर्ट में आवेदन भी लगाया गया था, लेकिन इसी बीच जाहिद खान ने अपने बुआओं और अन्य परिजनों को हिस्सा न देने की नीयत से पूरे प्रशासनिक तंत्र को अपने पक्ष में मोड़ने की साजिश रच डाली। सबसे गंभीर और चौंकाने वाला पहलू यह है कि 50 रूपए के नॉन ज्यूडिशियल स्टांप पेपर पर एक फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी तैयार किया गया। जबकि कानूनन पावर ऑफ अटॉर्नी का विधिवत पंजीकरण अनिवार्य होता है। आरोप है कि यह दस्तावेज 22 अक्टूबर 2021 की तारीख दर्शाकर बनाया गया और इसमें मृतक की बहन स्व. हबीबुल बेगम के फर्जी हस्ताक्षर तक कर दिए गए, जबकि उनका निधन बंटवारा प्रकरण जारी रहने के दौरान 9 दिसंबर 20223 को हो गया था। इससे भी गंभीर तथ्य यह है कि मुख्य खातेदार अब्दुल हसीम खान का निधन 12 अप्रैल 2022 को हो चुका था और उनकी मृत्यु के बाद ही इस फर्जी दस्तावेज के आधार पर जमीन की खरीदी–बिक्री को तेज़ी से अंजाम दिया गया, ताकि वारिसों को कानूनी लड़ाई लड़ने का मौका ही न मिल सके। आरोप है कि तत्कालीन पटवारी रामू कश्यप ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए बिना किसी वैधानिक आदेश, बिना नामांतरण और बिना तहसील रिकॉर्ड में विधिवत प्रविष्टि किए मूल खसरा नंबर 153/1 को मनमाने ढंग से 153/1 से 153/16 खसरा नंबर बनाते हुए विभाजित कर दिया। इस प्रक्रिया में करीब 62,340 वर्गफुट यानि लगभग डेढ़ एकड़ भूमि मूल खाते से गायब कर दी गई। इसके बाद भूमि दलाल कोंडागाव निवासी नेमीचंद सोनी ने इस जमीन को अपनी दुकान में काम करने वाले शिवलाल बैद के पुत्र मनचीत बैद के नाम फर्जी तरीके से बिना पंजीयन के नामांतरण करा दिया और जमीन को 12 से 15 हिस्सों में अलग-अलग लोगों को बेच डाला। फर्जी दस्तावेजों से जमीन के टुकड़े कर भूखंड नेमीचंद, बलराज सिंह भारद्वाज, करण सिंह नेताम, गोविंद कुमार साहू, चंद्रशेखर यादव, विजय दीवान, सोनमती ठाकुर, सविता बैद, कुंती सेठिया, हरिश्चंद्र सेठिया, डाकेश्वरी वर्मा सहित अन्य लोगों को बेचे गए और चौंकाने वाली बात यह है कि फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी खरीददारों से इलाज के नाम पर उधारी में राशि लेना बताया गया। मामला उस समय उजागर हुआ जब इन जमीनों पर निर्माण कार्य शुरू हुआ और पीड़ित वारिसों ने देखा कि उनके खातों से जमीन गायब हो चुकी है। इस बीच कमिश्नर कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि खसरा नंबर 153/1 की भूमि का बंटवारा जाहिद खान सहित सभी वैधानिक वारिसों सहेदुन बेगम, खतीजा बेगम, शाहिदा बेगम, मोहम्मद रमजान खान और खातून उर्फ साधना के बीच समान रूप से किया जाए, लेकिन आरोप है कि कोर्ट के आदेश के तुरंत बाद ही पटवारी ने रिकॉर्ड से जमीन का बड़ा हिस्सा गायब कर दिया। जब इस हेरफेर का खुलासा हुआ तो पीड़ित वारिसों ने भानपुरी थाना और कलेक्टर बस्तर को लिखित शिकायत दी।

कलेक्टर द्वारा जांच हेतु तहसील भानपुरी को पत्र भी लिखा है बावजूद आज तक न तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हुई, न ही एफआईआर दर्ज की गई और न ही फर्जी रजिस्ट्रियों पर रोक लगाई गई। मामला सामने आने के बाद पटवारी रामू कश्यप ने आनन-फानन में अपना तबादला लौंहडीगुड़ा तहसील में करवा लिया, जबकि इस प्रकरण से जुड़ा एक अन्य आरोपी मानचित्र वेद गायब है। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि शिकायत के बाद भी पुलिस और राजस्व विभाग ने केवल औपचारिकता निभाई और पूरे मामले को दबाने का प्रयास किया गया।
फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी, कूटरचना, धोखाधड़ी और सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर जैसे गंभीर आरोपों के बावजूद प्रशासन की चुप्पी यह सवाल खड़ा कर रही है कि क्या दोषियों को राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है? क्या राजस्व विभाग के भीतर और अधिकारी भी इस संगठित खेल में शामिल हैं? और आखिर कब फर्जी दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी? पीड़ित वारिस आज भी अपनी पैतृक जमीन के लिए न्याय की आस लगाए प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं, जबकि आरोपियों की आर्थिक हैसियत में अचानक आई बढ़ोत्तरी कई संदेहों को जन्म दे रही है।
