*अर्जुन झा*
*भानुप्रतापपुर।* आमाबेड़ा के बड़े तेवड़ा में हाल ही में हुए धर्मांतरण विवाद को लेकर जनजाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष देवलाल दुग्गा ने प्रदेश सरकार पर सवाल खड़े किए हैं। मंगलवार शाम पत्रकार भवन भानुप्रतापपुर में पत्रकारों से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यदि प्रदेश सरकार वास्तव में आदिवासी समाज की हितैषी है, तो उसे धर्मांतरण पर सख्त विधेयक लाना चाहिए।
देवलाल दुग्गा ने कहा कि आदिवासी समाज पर अत्याचार कोई नई बात नहीं है। मुगल शासन से लेकर अंग्रेजी हुकूमत तक आदिवासियों का शोषण होता रहा है। देश की आज़ादी के बाद भी कुछ राजनीतिक दलों और पूंजीपतियों के संरक्षण में बड़े पैमाने पर आदिवासियों का धर्मांतरण कराया गया। उन्होंने बताया कि जब धर्मांतरित हो चुके बुजुर्ग आदिवासियों से बातचीत की जाती है, तो बीमारी, शिक्षा और आर्थिक मजबूरी जैसे कारण सामने आते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासी समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी अपने पुरखों द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर अपने पारंपरिक धर्म, देवी-देवताओं और संस्कृति का पालन कर रहा है। यही कारण है कि समय-समय पर धर्मांतरण के विरोध में समाज के लोग आवाज उठाते रहे हैं। बड़े तेवड़ा में हुए विवाद पर टिप्पणी करते हुए श्री दुग्गा ने कहा कि इस घटना में आदिवासी समाज की गलती नहीं मानी जा सकती। उनके अनुसार पहले मसीही समाज के लोगों द्वारा लाठी-डंडों से हमला किया गया, जिसके बाद आदिवासियों ने आत्मरक्षा में प्रतिकार किया और स्थिति विवाद में बदल गई। उन्होंने कहा कि संवैधानिक दृष्टि से देखा जाए तो पेसा एक्ट के तहत ग्रामसभा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। देवलाल दुग्गा ने प्रदेश सरकार को स्मरण कराया कि विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान कुछ मंत्रियों ने धर्मांतरण पर विधेयक लाने की बात कही थी, लेकिन सत्र समाप्त हो गया और इस विषय पर कोई ठोस चर्चा नहीं हुई। श्री दुग्गा ने प्रदेश सरकार से अपील करते हुए कहा कि यदि किसी कारणवश शीतकालीन सत्र में धर्मांतरण पर विधेयक प्रस्तुत नहीं किया जा सका है, तो सरकार को चाहिए कि वह महामहिम राज्यपाल से अध्यादेश लाकर धर्मांतरण विरोधी कानून को तत्काल प्रभाव से लागू करे। उन्होंने कहा कि केवल बयानबाजी और आश्वासनों से आदिवासी समाज का विश्वास नहीं जीता जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि धर्मांतरण पर सख्त विधेयक लाकर ही सरकार यह प्रमाणित कर सकती है कि वह वास्तव में आदिवासी हितैषी है। ठोस कानून बने बिना आदिवासी समाज के प्रति सरकार का समर्पण नजर नहीं आएगा।
