भिलाई। नंदनवन जंगल सफारी से बायोडायवर्सिटी बढ़ाने और इन-ब्रीडिंग रोकने के उद्देश्य से मैत्रीबाग भेजी गई सफेद बाघिन *जया* ने सोमवार सुबह अंतिम सांस ली। करीब 11 वर्ष की जया को 20 मार्च 2024 को विनिमय प्रक्रिया के तहत मैत्रीबाग लाया गया था, लेकिन नया वातावरण उसे रास नहीं आया। उसकी दहाड़ पिंजरे के भीतर ही थम गई और वह धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई।
मैत्रीबाग प्रभारी डॉ. एन.के. जैन के अनुसार पोस्टमार्टम में स्पष्ट हुआ कि जया का अमाशय फट गया था। संभावना जताई गई है कि बाड़े में उछलने या अचानक जंपिंग के दौरान अमाशय पलटने से यह गंभीर स्थिति बनी और कुछ ही देर में उसकी जान चली गई। रविवार रात तक जया पूरी तरह सामान्य दिखाई दे रही थी, इसलिए उसकी मौत ने सभी को चौंका दिया।
जया के बदले मैत्रीबाग से सफेद बाघिन *रक्षा* को जंगल सफारी भेजा गया था। लगभग 609 दिनों तक जया मैत्रीबाग के सीमित बाड़े में रही, जबकि रक्षा नंदनवन के खुले वन क्षेत्र में घूमती रही। परंतु 610वीं सुबह जया की जिंदगी का सफर खत्म हो गया।
जया का पोस्टमार्टम पशु चिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन महाविद्यालय अंजोरा के डॉ. जसप्रीत सिंह और राज्य पशु चिकित्सा विभाग के डॉ. आर.के. गुप्ता द्वारा किया गया। शाम को मैत्रीबाग परिसर में ही उसका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ।
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### **बीते दशक में पांच बाघों की मौत का दुखद रिकॉर्ड**
सफेद बाघिन जया से पहले भी मैत्रीबाग में बाघों की मौत के कई मामले सामने आ चुके हैं—
* 2014: बाघिन दुर्गा
* 2015: नर्मदा की सांप काटने से मौत
* 2019: बंगाल टाइगर सतपुड़ा
* 2021: बाघिन वसुंधरा
* 2022: कैंसर से जूझ रहे सफेद बाघ किशन की मौत
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### **भारत में सफेद बाघ सिर्फ 160 — मैत्रीबाग ने दिए 19**
देश में सफेद बाघों की कुल संख्या अनुमानित रूप से 160 के करीब है, जिनमें से 19 बाघों का योगदान मैत्रीबाग से किया गया है। जया की मौत के बाद अब यहां सिर्फ 6 सफेद बाघ बचे हैं। वर्ष 1998 में नंदनकानन जू, भुवनेश्वर से आए जोड़ों ‘तापसी’ और ‘नाम’ ने पहली बार शावकों को जन्म दिया था, जिसके बाद से जैव विविधता बनाए रखने हेतु बाघों के आदान–प्रदान की प्रक्रिया लगातार जारी है।
जया की असमय मृत्यु ने वन्यजीव प्रेमियों और मैत्रीबाग प्रबंधन को गहरे दुख में डाल दिया है।
