*अर्जुन झा*
*जगदलपुर।* बस्तर जिले का इकलौता मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल बलीराम कश्यप मेडिकल कॉलेज डिमरापाल बीमार हो चला है। यहां की सीटी स्कैन, एक्स रे मशीन समेत तमाम जीवनोपयोगी उपकरण दम तोड़ते जा रहे हैं, वार्ड संक्रामक रोगों से पीड़ित हैं और टॉयलेटस बेजार हो चले हैं। ऐसे में भला यहां मरीजों के बेहतर ईलाज की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

स्व. बलिराम कश्यप स्मृति मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल पूरे बस्तर संभाग का एकमात्र सबसे बड़ा एवं सुविधा संपन्न अस्पताल माना जाता रहा है। संभाग के सातों जिलों के लोगों के लिए यह लाइफ लाइन रहा है, मगर यह सब अब बीते दिनों की बातें ही रह गई हैं। यह मेडिकल कॉलेज अब महज एक अध्ययन केंद्र बन कररह गया है। अपनी स्थापना के कुछ ही वर्षों में ही यह मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल अव्यस्थाओं से जूझ रहा है। शासन द्वारा सुशासन दिखाने का दावा तो किया जाता है किंतु मरीजों के उपचार के दौरान हो रही परेशानी की बात जब सामने आती है तो सुनकर दुख लगता है कि सुशासन सरकार की योजनाओं को स्वास्थ्य मंत्रालय किस कदर हल्के में लेकर सरकार की छवि को बट्टा लगा रहा है। मेडिकल कॉलेज में उपलब्ध जांच की हर बड़ी मशीन खराब है। सीटी स्कैन मशीन महीनों से काम नहीं कर रही है, वहीं एक्स रे मशीन से लेकर अन्य जीवन रक्षक उपकरण भी कबाड़ के तब्दील होते जा रहे हैं। महिला एवं पुरुष मरीजों के वार्डों, चाइल्ड वार्ड, गायनिक वार्ड में घुसते ही स्वस्थ व्यक्ति अपने को बीमार महसूस करने लगता है। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे इन वार्डों में संक्रामक बीमारियों के कीटाणु उड़ रुए रहे हैं। इन वार्डो के वाशरूम की दयनीय स्थिति है। यहां भर्ती मरीजों को परिजन निवृत कराने के लिए अस्पताल के बाहर ले जाने के लिए मजबूर हैं। यहां के टॉयलेट्स या तो चोक हो गए हैं, या फिर वहां पानी नहीं रहता। सड़ांध मारते टॉयलेट्स बीमारियों के जन्मदाता बन गए हैं। इस मेडिकल कॉलेज कम हॉस्पीटल में निस्तार के लिए तो दूर की बात पीने तक के लिए पानी की व्यवस्था नहीं है। भर्ती मरीजों के परिजन बाहर होटलों में जाकर प्यास बुझाते हैं या फिर उन्हें मिनरल वाटर की बोतल खरीदना पड़ता है।
*जूनियर स्टॉफ की मनमानी*
आज जब यह संवाददाता स्वयं मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग विभाग में एक बच्चे से मिलने पहुंचा, तो वहां का सिस्टम देख हैरान रह गया। इस दौरान एक बात साफ हो गई कि काजल की कोठरी में सबके सब काले धब्बे से रंगे हुए हैं। संवाददाता ने देखा कि डॉक्टर बार बार अपने जूनियर स्टाफ को निर्देश देते रहे किंतु जूनियर स्टॉफ उनकी बातों को लगातार अनसुना करते रहे। इससे यह मालूम हुआ कि कुछ डाक्टर अगर मरीज के पीछे मेहनत करते हैं, तो जूनियर स्टॉफ की एक लॉबी उन्हें स्पोर्ट नहीं करती है और डॉक्टर की सारी मेहनत पर पानी फेरने के लिए आमादा रहती है।
*मेडिकल माफिया का शिकंजा*
जानकारी के अनुसार स्व. बलिराम कश्यप मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल मेडिकल माफिया के शिकंजे में फंसा हुआ है। अगर आपको मेडिकल कॉलेज में इलाज करना है, तो यहां सक्रिय मेडिकल माफिया से संपर्क कर उनसे सेटिंग करनी पड़ेगी, वरना कोई विशेषज्ञ या सीनियर डाक्टर का मिलना तो दूर उल्टे जूनियर डाक्टर आपके इलाज के बहाने आपका पोस्टमार्टम करने पर उतारू हो जाएंगे। मेडिकल कॉलेज की हर गतिविधि से वाकिफ कुछ वरिष्ठ जानकार लोगों का कहना है कि यह कॉलेज मेडिकल माफियाओं से चलता है। वरिष्ठ डाक्टरों के गुट स्थानीय नेताओं से संपर्क में हैं, जो नेताओं के संरक्षण में कॉलेज में अपनी मनमानी करते हैं। नतीजतन आम आदमी सरकार की योजनाओं और सुविधाओं का लाभ नहीं ले पाता है।
*ठीक करेंगे व्यवस्थाएं*
मशीनें लगातार काम करने से खराब तो होती हैं, किंतु जल्दी ही उन्हें ठीक करा लिया जाएगा। दूसरी व्यवस्थाएं भी दुरुस्त की जाएंगी।
*डॉ. अनुरूप साहू,*
अधीक्षक, मेडिकल कॉलेज





