उज्जैन, 27 जनवरी (दुर्ग भिलाई अपडेट)।
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के गर्भगृह में वीआईपी प्रवेश को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इंकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि भगवान महाकाल के सामने सभी श्रद्धालु समान हैं, वहां कोई वीआईपी या विशेष दर्जा नहीं होता। गर्भगृह में प्रवेश से जुड़े नियम तय करना मंदिर प्रशासन का अधिकार क्षेत्र है, इसमें कोर्ट दखल नहीं देगी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वे अपनी मांग सीधे मंदिर प्रशासन के समक्ष रखें। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि धार्मिक स्थलों के आंतरिक प्रबंधन और नियमों में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि बीते ढाई वर्षों से आम श्रद्धालुओं के लिए गर्भगृह में प्रवेश बंद है, जबकि इस अवधि में वीआईपी और प्रभावशाली लोगों को नियमों को दरकिनार कर प्रवेश की अनुमति दी जाती रही है। उनके अनुसार यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
इससे पहले अगस्त 2025 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ भी इसी तरह की याचिका को खारिज कर चुकी है। हाईकोर्ट ने तब कहा था कि गर्भगृह में प्रवेश को लेकर निर्णय लेने का अधिकार उज्जैन जिला प्रशासन और महाकाल मंदिर समिति के पास है।
गौरतलब है कि कोरोना महामारी के बाद से महाकाल मंदिर में आम श्रद्धालुओं के लिए गर्भगृह दर्शन बंद हैं और भक्त बाहरी परिसर से ही भगवान महाकाल के दर्शन कर रहे हैं। हालांकि, समय-समय पर विशेष अनुमति के तहत कुछ लोगों के गर्भगृह में प्रवेश की खबरों को लेकर विवाद भी उठते रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा रुख के बाद अब पूरा मामला मंदिर प्रशासन के निर्णय पर निर्भर करेगा। साथ ही इस फैसले को नियमों में पारदर्शिता और निष्पक्षता की दिशा में एक अहम संकेत माना जा रहा है।
