नई दिल्ली, 21 जनवरी (दुर्ग भिलाई अपडेट)। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को बीते एक साल में हुए लगातार असफल प्रक्षेपणों के कारण बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है। पिछले 12 महीनों में इसरो के 3 महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा उपग्रह नष्ट हो गए हैं, जिनके प्रतिस्थापन में अब 2 से 3 वर्ष तक का समय लग सकता है।
इसरो से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इन उपग्रहों के दोबारा निर्माण और लॉन्च में देरी की सबसे बड़ी वजह रॉकेट और उपग्रहों में इस्तेमाल होने वाली उच्च तकनीक सामग्री और अंतरिक्ष-स्तरीय इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की आपूर्ति है। पिछले 6 प्रक्षेपण अभियानों में से 3 मिशन विफल रहे, जिनमें जीएसएलवी-एफ15 और पीएसएलवी के दो अहम मिशन शामिल हैं। ये सभी उपग्रह सरकारी फंड से तैयार किए गए थे और देश की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े थे।
इसरो के मुताबिक, रॉकेट निर्माण में लगभग 10 प्रतिशत और उपग्रह निर्माण में करीब 50 से 55 प्रतिशत तक पुर्जे विदेशों से आयात किए जाते हैं। इनमें मेमोरी चिप्स, सेंसर, ऑनबोर्ड कंप्यूटर, रिले और अन्य विशेष उपकरण शामिल हैं। कुछ पुर्जे आसानी से मिल जाते हैं, लेकिन कई अत्याधुनिक हिस्से विशेष ऑर्डर पर तैयार किए जाते हैं, जिनकी डिलीवरी में काफी समय लगता है।
भले ही सभी आवश्यक उपकरण समय पर उपलब्ध हो जाएं, फिर भी एक उपग्रह को पूरी तरह से असेंबल करने, एकीकृत करने और कठोर परीक्षणों से गुजारने में कई महीनों से लेकर वर्षों तक का वक्त लग जाता है। इसरो अपने अधिकतर उपग्रहों का निर्माण और परीक्षण अपने ही केंद्रों पर करता है, ऐसे में असफल मिशनों की भरपाई के लिए मानव संसाधनों के पुनर्विन्यास और चल रहे मिशनों की प्राथमिकता तय करना एजेंसी के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
गौरतलब है कि अगस्त 2021 में जीएसएलवी रॉकेट के क्रायोजेनिक चरण में तकनीकी खराबी के चलते पृथ्वी अवलोकन उपग्रह जीसैट-1 का प्रक्षेपण विफल रहा था, जिसका अब तक पूर्ण प्रतिस्थापन नहीं हो सका है। वहीं, जनवरी 2025 में थ्रस्टर वाल्व न खुलने के कारण एनवीएस-02 नेविगेशन उपग्रह भी अपनी निर्धारित कक्षा तक नहीं पहुंच पाया। जनवरी 2026 तक इस उपग्रह का भी नया संस्करण लॉन्च नहीं किया जा सका है।
इन असफलताओं के बाद इसरो के सामने न सिर्फ तकनीकी चुनौतियां हैं, बल्कि देश की सुरक्षा से जुड़े अंतरिक्ष मिशनों को समय पर पूरा करने की बड़ी जिम्मेदारी भी बनी हुई है।
